लोकेष्णा और गिरता विवेक
लेखक- आचार्य हंसराज मिश्रा
आज कंटेंट नहीं बन रहा—बल्कि लोकेष्णा की नीलामी हो रही है।
लाइक्स और व्यूज़ की अंधी भूख ने रचनात्मकता को नहीं, बल्कि चरित्र और विवेक को दांव पर लगा दिया है। जो जितना भड़कीला, जो जितना अश्लील—वही उतना वायरल। इस सस्ते गणित में कुछ लोग धीरे-धीरे अपनी पहचान खुद ही मिटाते जा रहे हैं।
सबसे भयावह सच यह है कि इस दौड़ में हमारे बच्चे और बच्चियाँ भी खींचे चले आ रहे हैं। कुछ पलों की प्रसिद्धि के लिए ऐसा कंटेंट परोसा जा रहा है, जो गंदी नज़रें बुलाता है और भविष्य पर स्थायी दाग छोड़ जाता है। यह मान लेना भारी भूल है कि “हम बाद में मिटा देंगे, किसी तक नहीं पहुँचेगा।” डिजिटल दुनिया में कुछ भी पूरी तरह मिटता नहीं। सब कुछ कहीं-न-कहीं पहुँचता है। भले कोई खुले तौर पर बोले न बोले, भीतर अच्छा किसी को भी नहीं लगता। मजबूरी भले चुप करा दे, पर दर्द चुप नहीं रहता।
समाज को हँसी चाहिए, हवस नहीं। मनोरंजन चाहिए, नग्न सोच नहीं।
आज जब ऐसा कंटेंट अचानक स्क्रीन पर उभर आता है, तो नज़रें शर्म से झुक जाती हैं। हवा में ज़हर घुल चुका है और हम उसे सामान्य मानने लगे हैं—यही सबसे खतरनाक स्थिति है।
यह भी समझना ज़रूरी है कि हर लाइक समर्थन नहीं होता। कई लोग आपको पहचानते हैं, इसलिए कमेंट कर देते हैं। और कुछ लोग केवल इसलिए, ताकि आपको गिरते हुए देख सकें। कई कमेंट आपकी खुशी और इज्जत तोड़ने के लिए होते हैं। कुछ आपकी गिरावट दिखाकर आपके पूरे परिवार और बच्चों को नीचा दिखाने की कोशिश होते हैं। यह खेल समझने की ज़रूरत है, इसमें भागीदार बनने की नहीं।
आज संभल जाना—आपके बच्चों के भविष्य के लिए, आपकी सामाजिक पहचान के लिए और आपके आत्मसम्मान के लिए—सबसे सही निर्णय हो सकता है।
याद रखिए, वायरल होना सफलता नहीं है। सम्मान का बचा रहना ही असली उपलब्धि है। आज की पोस्ट ही कल आपका परिचय बनेगी। इसलिए फैसला अभी कीजिए—लोकेष्णा या लोकहित। यह कोई साधारण विकल्प नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।